झारखंड में होने वाले नगर निकाय चुनाव इस बार सिर्फ राजनीतिक समीकरणों के कारण नहीं, बल्कि खर्च की सख्त सीमा को लेकर भी चर्चा में हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि निकाय चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी 25 लाख रुपये से अधिक खर्च नहीं कर सकेंगे। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार और अन्य गतिविधियों पर होने वाले हर खर्च का पूरा लेखा-जोखा आयोग को देना अनिवार्य होगा। आयोग के इस फैसले को चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और समान अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
क्यों चर्चा में है यह फैसला?
झारखंड में लंबे समय बाद नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों के चुनाव होने जा रहे हैं। पिछले चुनावों में यह आरोप लगते रहे हैं कि स्थानीय निकाय चुनावों में पैसे का अत्यधिक इस्तेमाल होता है, जिससे आम और साधनहीन उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं।
इन्हीं शिकायतों को ध्यान में रखते हुए झारखंड राज्य निर्वाचन आयोग ने इस बार खर्च सीमा को सख्ती से लागू करने का फैसला लिया है।
कितनी है खर्च की सीमा?
निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार:
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नगर निगम चुनाव में प्रत्याशी अधिकतम 25 लाख रुपये तक खर्च कर सकते हैं
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नगर परिषद और नगर पंचायत के लिए यह सीमा पद और क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग तय की जा सकती है
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तय सीमा से एक रुपये भी अधिक खर्च करना चुनावी नियमों का उल्लंघन माना जाएगा
इस सीमा में चुनाव प्रचार से जुड़े सभी खर्च—जैसे पोस्टर, बैनर, होर्डिंग, वाहन, सभाएं, सोशल मीडिया प्रचार और कार्यकर्ताओं पर होने वाला व्यय—शामिल होगा।
हिसाब-किताब देना क्यों जरूरी?
इस बार आयोग ने केवल खर्च सीमा तय करके ही जिम्मेदारी खत्म नहीं की है, बल्कि प्रत्याशियों पर खर्च का पूरा ब्योरा देने की बाध्यता भी डाली है।
हर उम्मीदवार को:
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चुनाव प्रचार के दौरान होने वाले खर्च का अलग से रजिस्टर रखना होगा
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प्रत्येक खर्च के साथ बिल और रसीद संलग्न करनी होगी
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चुनाव समाप्त होने के बाद तय समय-सीमा के भीतर खर्च का पूरा विवरण निर्वाचन आयोग को सौंपना होगा
आयोग द्वारा नियुक्त व्यय पर्यवेक्षक (Expenditure Observers) इस पूरे खर्च की निगरानी करेंगे।
नियम तोड़ने पर क्या होगी कार्रवाई?
यदि कोई प्रत्याशी:
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तय सीमा से अधिक खर्च करता है
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खर्च का सही विवरण नहीं देता
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या जानबूझकर खर्च छिपाने की कोशिश करता है
तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है। इसमें:
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उम्मीदवारी रद्द होना
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चुनाव परिणाम को चुनौती
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भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध
जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं। आयोग ने साफ किया है कि पैसे के दम पर चुनाव जीतने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
काले धन पर लगाम की कोशिश
झारखंड निकाय चुनावों में खर्च सीमा को लेकर यह सख्ती काले धन के इस्तेमाल पर रोक लगाने की दिशा में अहम मानी जा रही है। स्थानीय चुनावों में अक्सर नगद वितरण, महंगे प्रचार और बाहरी संसाधनों के इस्तेमाल की शिकायतें आती रही हैं।
आयोग का मानना है कि:
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सीमित खर्च से चुनाव सस्ता और निष्पक्ष बनेगा
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धनबल के बजाय विचार और काम के आधार पर चुनाव होगा
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स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा
छोटे और नए उम्मीदवारों को मिलेगा फायदा
इस फैसले से उन उम्मीदवारों को खास फायदा मिलने की उम्मीद है, जो:
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पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं
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आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं
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स्थानीय मुद्दों के आधार पर जनता से जुड़ना चाहते हैं
अब महंगे प्रचार अभियानों की जगह जनसंपर्क, संवाद और जमीनी काम ज्यादा मायने रखेंगे। इससे राजनीति में नए और ईमानदार चेहरों को आगे आने का मौका मिल सकता है।
सोशल मीडिया खर्च भी निगरानी में
पहली बार झारखंड निकाय चुनावों में सोशल मीडिया प्रचार पर भी आयोग की पैनी नजर रहेगी।
फेसबुक, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किए जाने वाले:
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पेड विज्ञापन
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प्रमोशनल वीडियो
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ऑनलाइन प्रचार सामग्री
को भी चुनावी खर्च में जोड़ा जाएगा। प्रत्याशियों को डिजिटल प्रचार के खर्च का भी पूरा ब्योरा देना होगा।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
आयोग के इस फैसले पर राजनीतिक दलों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आई है।
कुछ दलों ने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताया है, वहीं कुछ नेताओं का कहना है कि:
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जमीनी स्तर पर खर्च को नियंत्रित करना आसान नहीं होगा
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समर्थकों द्वारा किए गए खर्च को मापना मुश्किल हो सकता है
हालांकि आयोग का कहना है कि नियम सभी के लिए समान हैं और किसी को छूट नहीं दी जाएगी।
झारखंड के लोकतंत्र के लिए क्या मायने?
विशेषज्ञों के अनुसार, खर्च सीमा और सख्त निगरानी:
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स्थानीय स्वशासन को मजबूत करेगी
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भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाएगी
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नगर निकायों में जवाबदेही बढ़ाएगी
नगर निकाय चुनाव सीधे तौर पर शहरों और कस्बों के विकास से जुड़े होते हैं। ऐसे में निष्पक्ष चुनाव से चुने गए प्रतिनिधि जनता की समस्याओं को ज्यादा प्रभावी ढंग से उठा सकते हैं।
निष्कर्ष
झारखंड निकाय चुनाव में 25 लाख रुपये की खर्च सीमा और चुनाव आयोग को अनिवार्य हिसाब-किताब देने का नियम लोकतंत्र को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
यह फैसला साफ संकेत देता है कि अब चुनाव पैसे के दम पर नहीं, बल्कि जनसमर्थन और काम के आधार पर जीते जाएंगे।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ये सख्त नियम ज़मीनी स्तर पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू होते हैं और क्या इससे झारखंड की स्थानीय राजनीति में सचमुच सकारात्मक बदलाव आता है।
