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21 Jan 2026, Wed

झारखंड–बिहार में सक्रिय नक्सली मुंबई से गिरफ्तार, खत्म हो चुके संगठनों को फिर से खड़ा करने की साजिश

झारखंड–बिहार में सक्रिय नक्सली मुंबई से गिरफ्तार, खत्म हो चुके संगठनों को फिर से खड़ा करने की साजिश

देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ी सफलता सामने आई है। झारखंड और बिहार में सक्रिय एक कुख्यात नक्सली को मुंबई से गिरफ्तार किया गया है, जो लंबे समय से खत्म हो चुके नक्सली संगठनों को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश में जुटा था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, यह गिरफ्तारी नक्सल नेटवर्क की शहरी रणनीति और अंतरराज्यीय साजिशों को उजागर करती है।

गिरफ्तार नक्सली पर आरोप है कि वह ग्रामीण इलाकों में कमजोर पड़ चुके नक्सली संगठनों को नए सिरे से संगठित करने, फंडिंग जुटाने और शहरी क्षेत्रों से लॉजिस्टिक सपोर्ट उपलब्ध कराने की भूमिका निभा रहा था।


खबरों में क्यों?

सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई में यह गिरफ्तारी मुंबई से की गई। जांच में सामने आया है कि आरोपी का नेटवर्क झारखंड और बिहार के नक्सल प्रभावित जिलों से जुड़ा हुआ था।

अधिकारियों के मुताबिक, वह ऐसे नक्सली संगठनों को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा था, जो सुरक्षा बलों की सख्त कार्रवाई के बाद लगभग निष्क्रिय हो चुके थे। यह मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नक्सल आंदोलन को अब शहरी समर्थन और वैचारिक नेटवर्क के ज़रिये फिर से खड़ा करने की रणनीति अपनाई जा रही थी।


मुंबई से गिरफ्तारी क्यों अहम?

नक्सली गतिविधियाँ आमतौर पर ग्रामीण और जंगल क्षेत्रों तक सीमित मानी जाती रही हैं, लेकिन यह गिरफ्तारी इस बात का संकेत है कि नक्सली नेटवर्क अब महानगरों को सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं।

जांच एजेंसियों के अनुसार:

  • मुंबई जैसे शहरों में छिपकर रहना अपेक्षाकृत आसान होता है

  • शहरी क्षेत्रों से फंडिंग, संपर्क और प्रचार करना सरल होता है

  • पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी से बचने के नए तरीके अपनाए जाते हैं

यही वजह है कि यह गिरफ्तारी नक्सलवाद की बदलती रणनीति को समझने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


खत्म हो चुके संगठनों को दोबारा खड़ा करने की साजिश

सुरक्षा सूत्रों के अनुसार, आरोपी का मुख्य उद्देश्य उन नक्सली संगठनों को फिर से सक्रिय करना था, जो पिछले एक दशक में—

  • नेतृत्व के खत्म होने

  • फंडिंग रुकने

  • और लगातार सुरक्षा अभियानों

के कारण कमजोर पड़ चुके थे।

आरोपी कथित तौर पर:

  • पुराने कैडर से संपर्क साध रहा था

  • नए युवाओं को वैचारिक रूप से प्रभावित करने की कोशिश कर रहा था

  • और सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क खड़ा करने की योजना बना रहा था

यह रणनीति दिखाती है कि नक्सल संगठन अब सीधे हिंसा के बजाय धीरे-धीरे नेटवर्क विस्तार पर ध्यान दे रहे हैं।


झारखंड और बिहार में नक्सल स्थिति

झारखंड और बिहार लंबे समय से नक्सल प्रभावित राज्यों में शामिल रहे हैं। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में—

  • सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी

  • खुफिया तंत्र के सशक्त होने

  • और विकास परियोजनाओं के विस्तार

के चलते नक्सली घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आई है।

इसके बावजूद, सुरक्षा एजेंसियाँ मानती हैं कि नक्सलवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि वह नए रूप और नई रणनीति के साथ दोबारा सिर उठाने की कोशिश कर रहा है।


सुरक्षा एजेंसियों की संयुक्त कार्रवाई

इस गिरफ्तारी को केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों के बेहतर समन्वय का नतीजा माना जा रहा है। खुफिया जानकारी के आधार पर लंबे समय से आरोपी की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।

सूत्रों के अनुसार:

  • आरोपी के डिजिटल कम्युनिकेशन की निगरानी की जा रही थी

  • उसके संपर्कों और लेन-देन की जांच की गई

  • और सही समय पर कार्रवाई कर उसे गिरफ्तार किया गया

इस ऑपरेशन में मुंबई पुलिस की भूमिका अहम मानी जा रही है।


शहरी नक्सलवाद की चुनौती

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला तथाकथित ‘शहरी नक्सलवाद’ की चुनौती को रेखांकित करता है। इसमें—

  • वैचारिक समर्थन

  • फंडिंग नेटवर्क

  • और लॉजिस्टिक मदद

शहरों से संचालित की जाती है, जबकि ज़मीनी हिंसा ग्रामीण क्षेत्रों में होती है।

इसी वजह से सुरक्षा एजेंसियाँ अब केवल जंगलों तक सीमित न रहकर महानगरों में भी सतर्कता बढ़ा रही हैं


आंतरिक सुरक्षा पर क्या असर?

इस गिरफ्तारी से यह स्पष्ट होता है कि नक्सल संगठनों को पूरी तरह खत्म मान लेना जल्दबाज़ी होगी। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि—

  • सुरक्षा एजेंसियाँ पहले से कहीं ज़्यादा सतर्क हैं

  • खुफिया तंत्र मजबूत हुआ है

  • और अंतरराज्यीय समन्वय बेहतर हुआ है

इन सबका परिणाम है कि नक्सली नेटवर्क को दोबारा खड़ा करने की कोशिशें शुरुआती चरण में ही नाकाम की जा रही हैं।


निष्कर्ष

झारखंड–बिहार में सक्रिय नक्सली की मुंबई से गिरफ्तारी भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह न केवल नक्सलवाद की बदलती रणनीति को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि सुरक्षा एजेंसियाँ अब हर मोर्चे पर सतर्क हैं—चाहे वह जंगल हों या महानगर।

खत्म हो चुके नक्सली संगठनों को फिर से सक्रिय करने की यह कोशिश भले ही नाकाम हो गई हो, लेकिन यह एक चेतावनी जरूर है कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है

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