Taliban warns Pakistan: सीमा पर फिर तनाव, अफगान मंत्री की कड़ी चेतावनी — “हमारे सब्र की परीक्षा न लें”
इस्तांबुल / काबुल / इस्लामाबाद:
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद और आतंकवाद विरोधी मुद्दों को लेकर एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। तुर्किए के इस्तांबुल में जब दोनों देशों के प्रतिनिधि तीसरे दौर की शांति वार्ता में शामिल थे, उसी दौरान सीमा पर फिर से गोलीबारी की खबर आई। वार्ता के समानांतर, अफगान तालिबान के एक वरिष्ठ मंत्री ने पाकिस्तान को सीधे और तीखे शब्दों में चेतावनी दी — “अफगानिस्तान के सब्र की परीक्षा मत लो।”
🔥 अफगान मंत्री की कड़ी भाषा — “घमंड न करे पाकिस्तान”
टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान के जनजातीय और सीमाई मामलों के मंत्री नूरुल्लाह नूरी ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ को संबोधित करते हुए कहा कि पाकिस्तान को अपनी सैन्य शक्ति और तकनीक पर घमंड नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा —
“पाकिस्तान को यह याद रखना चाहिए कि अफगानिस्तान साम्राज्यों का कब्रिस्तान है। जो भी देश हमारे संकल्प को चुनौती देता है, उसे इतिहास ने हमेशा सबक सिखाया है। अफगान राष्ट्र के धैर्य की परीक्षा मत लो।”
नूरी ने यह भी कहा कि अगर तनाव जारी रहा, तो “अफगानिस्तान में बूढ़े से लेकर बच्चा तक” पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में खड़ा होगा। यह बयान दोनों देशों के बीच चल रही कूटनीतिक वार्ता के बीच आया, जिससे बातचीत का माहौल और जटिल हो गया।
⚔️ सीमा पर संघर्ष और बढ़ता तनाव
वार्ता के दौरान ही पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सेनाओं के बीच डूरंड लाइन (Durand Line) के पास गोलीबारी हुई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को संघर्ष शुरू करने के लिए जिम्मेदार ठहराया।
पाकिस्तान के सूचना मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा —
“गोलीबारी की शुरुआत अफगान पक्ष ने की थी, जिसका हमारे सुरक्षा बलों ने संयमित लेकिन प्रभावी जवाब दिया। स्थिति अब नियंत्रण में है और संघर्षविराम अब भी लागू है।”
वहीं, अफगान अधिकारियों ने दावा किया कि पाकिस्तानी सेना ने सीमा पार टीटीपी (Tehreek-e-Taliban Pakistan) के ठिकानों पर हमले किए, जिससे स्थानीय इलाकों में भारी नुकसान हुआ।
🕌 इस्तांबुल में तीसरे दौर की वार्ता
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह तीसरा दौर तुर्किए और कतर की मध्यस्थता में आयोजित हुआ।
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ताहिर हुसैन अंद्राबी ने बताया —
“हमने अफगान प्रतिनिधिमंडल के सामने अपनी साक्ष्य-आधारित, न्यायोचित और तार्किक मांगें रखीं, जिनका उद्देश्य केवल सीमापार आतंकवाद को समाप्त करना है।”
उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थ देशों — तुर्किए और कतर — ने पाकिस्तान के रुख का अंतरराष्ट्रीय कानून और साक्ष्यों के आधार पर समर्थन किया है।
इस वार्ता का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सीमा हिंसा, आतंकवादी ठिकानों और पारस्परिक विश्वास बहाली पर सहमति बनाना था। लेकिन तालिबान मंत्री की धमकी ने वार्ता के सकारात्मक माहौल को झटका दिया।
☠️ पाकिस्तान का आरोप: “अफगानिस्तान टीटीपी को पनाह दे रहा”
इस्लामाबाद का आरोप है कि अफगान तालिबान ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) जैसे आतंकी समूहों को शरण दी है, जो पाकिस्तान के अंदर हमले करते हैं।
हाल ही में डूरंड लाइन के आसपास हिंसा में बढ़ोतरी हुई, जिसके बाद पाकिस्तान ने अफगान क्षेत्र में स्थित टीटीपी ठिकानों पर हवाई हमले किए।
पाकिस्तान का कहना है कि काबुल ने अपनी यह प्रतिबद्धता पूरी नहीं की कि उसकी जमीन का इस्तेमाल पाकिस्तान विरोधी आतंकवाद के लिए नहीं होगा।
दूसरी ओर, तालिबान इन आरोपों को सिरे से नकारता है। उसका कहना है कि यह “पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा समस्या” है और अफगानिस्तान का इससे कोई लेना-देना नहीं।
🧭 अफगानिस्तान की प्रतिक्रिया: “हम संप्रभु हैं, किसी के अधीन नहीं”
तालिबान मंत्री नूरुल्लाह नूरी का बयान सिर्फ चेतावनी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है —
अफगान तालिबान अब यह दिखाना चाहता है कि वह पाकिस्तान के प्रभाव से मुक्त है।
काबुल में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तालिबान शासन अब खुद को “स्वतंत्र और संप्रभु सरकार” के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है और इस्लामाबाद की “छाया” से बाहर निकलना चाहता है।
नूरी ने पाकिस्तान को याद दिलाया कि अमेरिका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियाँ भी अफगानिस्तान में विफल हुई थीं —
“अमेरिका और रूस हमारे दुश्मन थे, वे दूर थे। लेकिन पाकिस्तान हमारे पड़ोस में है — अगर संघर्ष बढ़ा, तो उसका असर सीधा और गहरा होगा।”
💬 सोशल मीडिया और ‘गलत सूचना’ का मुद्दा
पाकिस्तान के प्रवक्ता अंद्राबी ने कहा कि सोशल मीडिया पर अफगान खातों से फैलाई जा रही कई सूचनाएँ “अटकलें” या “जानबूझकर फैलाई गई गलत जानकारी” हैं।
उन्होंने जोर दिया कि “पाकिस्तान वार्ता के लिए प्रतिबद्ध है और चाहता है कि अफगान अधिकारी भी उसी भावना में काम करें।”
⚖️ वार्ता का इतिहास और मौजूदा स्थिति
यह इस्तांबुल वार्ता दरअसल अक्टूबर में हुई दोहा बैठक की निरंतरता है।
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पहला दौर: 19 अक्टूबर, दोहा (Qatar)
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दूसरा दौर: 25 अक्टूबर, इस्तांबुल
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तीसरा दौर: 7 नवंबर, इस्तांबुल
इन वार्ताओं में आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, और आर्थिक सहयोग जैसे विषयों पर चर्चा हुई, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं बन सका।
इससे पहले अक्टूबर में हुई झड़पों में पाकिस्तान ने दावा किया था कि अफगान तालिबान के 206 और टीटीपी के 110 चरमपंथी मारे गए थे, जबकि उसके 23 सैनिकों की मौत हुई।
संघर्ष विराम के बाद अस्थायी शांति तो लौटी, लेकिन अब हालिया गोलीबारी और बयानबाज़ी ने स्थिति फिर से नाजुक बना दी है।
🌍 क्षेत्रीय असर और अंतरराष्ट्रीय चिंताएँ
अफगानिस्तान-पाकिस्तान तनाव का असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं है।
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मध्य एशिया के पड़ोसी देशों को डर है कि सीमा हिंसा और आतंकवाद फिर से फैल सकता है।
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भारत सहित दक्षिण एशिया के अन्य देश इस स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
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अमेरिका और रूस ने अब तक इस विवाद पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन कूटनीतिक चैनलों से संयम बरतने की अपील की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान में स्थिरता तब तक नहीं आ सकती जब तक दोनों देश विश्वास बहाली और सीमा सहयोग का ढांचा विकसित नहीं करते।
🧩 निष्कर्ष — तल्ख़ बयान, नाज़ुक संतुलन
तालिबान मंत्री की यह चेतावनी सिर्फ शब्दों की लड़ाई नहीं है; यह उस गहराते अविश्वास की झलक है जो दशकों से दोनों देशों के बीच बना हुआ है।
अफगानिस्तान का “साम्राज्यों की कब्र” वाला रूपक यह दर्शाता है कि वह किसी भी बाहरी दबाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं।
दूसरी ओर, पाकिस्तान अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर दृढ़ है और चाहता है कि काबुल ठोस कदम उठाए।
इस्तांबुल वार्ता, कतर और तुर्किए की मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव — ये सब प्रयास अभी भी एक नाजुक शांति संतुलन को बनाए हुए हैं।
अगर दोनों पक्ष संयम न बरतें, तो यह विवाद एक बार फिर दक्षिण एशिया की स्थिरता को चुनौती दे सकता है।
कूटनीति की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि क्या दोनों देश इतिहास से सबक लेकर संवाद की मेज़ पर सच्चे समाधान की ओर लौट पाते हैं या नहीं।
