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22 Jan 2026, Thu

बजट व्यावहारिक व लचीलापन बढ़ाने वाला हो: पढ़ें अजित रानाडे का विचार

बजट व्यावहारिक व लचीलापन बढ़ाने वाला हो: पढ़ें अजित रानाडे का विचार

हर साल केंद्रीय बजट को लेकर उम्मीदों का लंबा सिलसिला होता है। कोई टैक्स में राहत चाहता है, तो कोई सब्सिडी में बढ़ोतरी। लेकिन प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अजित रानाडे के अनुसार, बजट का असली उद्देश्य केवल घोषणाओं या लोकलुभावन वादों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे व्यावहारिक, लचीला और बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप होना चाहिए। उनके विचार आज के अनिश्चित वैश्विक और घरेलू आर्थिक माहौल में और भी प्रासंगिक हो जाते हैं।


बदलती अर्थव्यवस्था और बजट की भूमिका

अजित रानाडे मानते हैं कि आज की अर्थव्यवस्था पहले से कहीं अधिक अनिश्चित और अस्थिर हो चुकी है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, सप्लाई चेन में बाधाएँ, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी बदलाव और घरेलू मांग में उतार-चढ़ाव—ये सभी ऐसे कारक हैं, जिनका प्रभाव किसी भी देश के आर्थिक अनुमान को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में एक कठोर और पूर्व-निर्धारित बजट ढांचा अक्सर अप्रासंगिक साबित हो जाता है। रानाडे के अनुसार, बजट को एक जीवंत नीति दस्तावेज़ के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें परिस्थितियों के अनुसार बदलाव की गुंजाइश हो।


व्यावहारिक बजट का क्या अर्थ है?

अजित रानाडे के विचार में “व्यावहारिक बजट” वह है जो ज़मीनी सच्चाइयों को ध्यान में रखे।

  • राजस्व और व्यय के अनुमान यथार्थवादी हों

  • कर संग्रह और विकास व्यय के बीच संतुलन बना रहे

  • घोषणाओं से ज़्यादा क्रियान्वयन क्षमता पर ज़ोर हो

वे मानते हैं कि अक्सर बजट में बहुत ऊँचे लक्ष्य तय कर दिए जाते हैं, जिन्हें साल के अंत तक हासिल करना मुश्किल हो जाता है। इससे न केवल वित्तीय अनुशासन प्रभावित होता है, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।


लचीलापन क्यों है ज़रूरी?

रानाडे का तर्क है कि बजट में लचीलापन (Flexibility) आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। अर्थव्यवस्था किसी तय स्क्रिप्ट पर नहीं चलती। कभी महँगाई बढ़ जाती है, तो कभी वैश्विक मंदी का खतरा मंडराने लगता है।

यदि बजट बहुत सख्त ढांचे में बंधा हो, तो सरकार के पास नीतिगत प्रतिक्रिया की गुंजाइश कम रह जाती है। इसके विपरीत, एक लचीला बजट सरकार को यह अवसर देता है कि वह:

  • ज़रूरत पड़ने पर पूंजीगत व्यय बढ़ा सके

  • सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को मजबूत कर सके

  • संकट के समय मांग को सहारा दे सके


राजकोषीय अनुशासन बनाम विकास

अजित रानाडे इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि राजकोषीय अनुशासन और विकास को आमने-सामने खड़ा करना सही नहीं है। अक्सर यह बहस होती है कि घाटा कम किया जाए या खर्च बढ़ाया जाए।

उनके अनुसार, असली सवाल यह होना चाहिए कि खर्च किस पर और किस गुणवत्ता का है। यदि सरकार:

  • इंफ्रास्ट्रक्चर

  • शिक्षा और स्वास्थ्य

  • कौशल विकास

जैसे क्षेत्रों में निवेश करती है, तो इससे दीर्घकाल में राजस्व बढ़ता है और घाटा अपने आप काबू में आता है।


कर प्रणाली में स्थिरता और सरलता

रानाडे मानते हैं कि बजट को करदाताओं के लिए सरल और पूर्वानुमेय होना चाहिए। बार-बार टैक्स दरों और नियमों में बदलाव से अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे निवेश और उपभोग दोनों प्रभावित होते हैं।

उनके अनुसार:

  • टैक्स बेस को व्यापक बनाया जाए

  • अनुपालन आसान किया जाए

  • विवादों को कम करने पर ध्यान दिया जाए

इससे सरकार को स्थिर राजस्व मिलेगा और अर्थव्यवस्था में भरोसा बढ़ेगा।


राज्यों की भूमिका और सहकारी संघवाद

अजित रानाडे बजट को केवल केंद्र का दस्तावेज़ नहीं मानते। उनके अनुसार, राज्यों की वित्तीय सेहत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि राज्यों के पास पर्याप्त संसाधन और लचीलापन नहीं होगा, तो ज़मीनी स्तर पर विकास अधूरा रह जाएगा।

वे सहकारी संघवाद की वकालत करते हुए कहते हैं कि:

  • कर हस्तांतरण समय पर हो

  • राज्यों को अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च करने की स्वतंत्रता मिले

  • केंद्र और राज्यों के बीच संवाद मजबूत हो


आगे की राह

रानाडे का निष्कर्ष स्पष्ट है—आज के दौर में बजट को किसी वार्षिक अनुष्ठान की तरह नहीं, बल्कि आर्थिक दिशा तय करने वाले उपकरण की तरह देखा जाना चाहिए। यह तभी संभव है जब बजट:

  • व्यावहारिक हो

  • लचीला हो

  • और दीर्घकालिक विकास को ध्यान में रखकर तैयार किया गया हो


निष्कर्ष

अजित रानाडे के विचार हमें यह समझाते हैं कि एक अच्छा बजट वही है जो न केवल आंकड़ों में संतुलित दिखे, बल्कि ज़मीनी हकीकत में भी काम करे। व्यावहारिकता और लचीलापन—ये दोनों मिलकर ही बजट को एक प्रभावी आर्थिक दस्तावेज़ बनाते हैं। बदलती दुनिया में भारत की आर्थिक मजबूती इसी बात पर निर्भर करेगी कि उसका बजट कितनी समझदारी और दूरदृष्टि से तैयार किया गया है।

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