‘बैटल ऑफ बेगम्स’ खत्म: दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर, खालिदा की मौत पर क्या बोलीं हसीना?
बांग्लादेश की राजनीति में दशकों तक छाया रहा ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ आखिरकार एक युग के अंत तक पहुंच गया। यह सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं थी, बल्कि दो पुरानी साथियों के बीच गहरी व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की कहानी थी—एक ओर खालिदा जिया, दूसरी ओर शेख हसीना। दोनों ने बारी-बारी से देश की सत्ता संभाली, लेकिन आपसी अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप और कटुता ने इस रिश्ते को इतिहास की सबसे तीखी राजनीतिक दुश्मनियों में बदल दिया।
दोस्ती से दुश्मनी कैसे बनी?
1970–80 के दशक में बांग्लादेश की राजनीति अपेक्षाकृत छोटी और परस्पर जुड़ी हुई थी। व्यक्तिगत जान-पहचान और साझा मंच आम बात थे। खालिदा जिया और शेख हसीना भी शुरुआती वर्षों में एक-दूसरे से परिचित थीं।
लेकिन जैसे-जैसे सत्ता की लड़ाई तेज हुई, वैचारिक मतभेद और व्यक्तिगत चोटें उभरती चली गईं।
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खालिदा जिया, पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की पत्नी, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की नेता बनीं।
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शेख हसीना, राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर रहमान की पुत्री, आवामी लीग का चेहरा बनीं।
दोनों की राजनीतिक विरासतें अलग थीं—एक राष्ट्रवाद और सैन्य पृष्ठभूमि से निकली पार्टी, दूसरी मुक्ति संग्राम की विरासत पर टिकी पार्टी। यहीं से टकराव की जमीन तैयार हुई।
सत्ता की अदला-बदली और बढ़ती कटुता
1991 से 2008 तक बांग्लादेश में सत्ता का झूला इन दो नेताओं के बीच झूलता रहा।
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1991 में खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं।
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1996 और फिर 2009 से शेख हसीना सत्ता में लौटीं।
इस दौरान संसद बहिष्कार, सड़क आंदोलनों, चुनावी विवाद और संस्थानों पर नियंत्रण को लेकर आरोपों ने राजनीति को शून्य-योग खेल बना दिया—जहां एक की जीत दूसरे की हार थी। व्यक्तिगत संवाद लगभग समाप्त हो गया।
‘दोस्तों में दुश्मनी’ के प्रतीक क्षण
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एक-दूसरे के कार्यक्रमों का बहिष्कार
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सार्वजनिक मंचों से तीखे व्यक्तिगत हमले
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कानूनी मामलों और भ्रष्टाचार के आरोप
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विपक्ष को “राष्ट्र-विरोधी” ठहराने की भाषा
इन सबने राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल दिया। ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ शब्द इसी दौर में लोकप्रिय हुआ।
खालिदा जिया का अंतिम अध्याय
लंबी बीमारी और कानूनी उलझनों के बीच खालिदा जिया सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे दूर होती चली गईं। अंततः उनके निधन की खबर ने देश को ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दिया—क्या यह प्रतिद्वंद्विता अब भी उतनी ही तीखी रहेगी?
खालिदा की मौत पर शेख हसीना की प्रतिक्रिया
राजनीतिक इतिहास की कड़वाहट के बावजूद, शेख हसीना की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत संयमित और मानवीय रही। उन्होंने शोक संदेश में खालिदा जिया के योगदान को याद किया और उनके परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की।
हालांकि शब्दों में औपचारिकता थी, लेकिन यह संकेत स्पष्ट था कि एक युग समाप्त हो चुका है—जहां व्यक्तिगत दुश्मनी राजनीति पर हावी थी।
‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का राजनीतिक अर्थ
इस प्रतिद्वंद्विता ने बांग्लादेश की राजनीति को कई तरह से प्रभावित किया:
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ध्रुवीकरण बढ़ा—मध्य मार्ग सिमटा
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संस्थागत राजनीति कमजोर हुई
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नेतृत्व का केंद्रीकरण बढ़ा
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विपक्ष–सत्ता संवाद टूटता चला गया
लेकिन साथ ही, इस दौर ने राजनीतिक भागीदारी और जन-राजनीति को भी तेज किया—चुनाव, आंदोलन और बहसें लगातार सुर्खियों में रहीं।
आगे की राह: नई पीढ़ी की राजनीति?
खालिदा जिया के जाने के साथ ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का अध्याय बंद हो गया है। सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश की राजनीति अब कम व्यक्तिगत और अधिक संस्थागत होगी?
क्या सत्ता–विपक्ष के रिश्ते संवाद की ओर लौटेंगे? या ध्रुवीकरण किसी नए रूप में जारी रहेगा?
निष्कर्ष
खालिदा जिया और शेख हसीना की कहानी सिर्फ दो नेताओं की नहीं, बल्कि एक देश के लोकतांत्रिक संघर्षों की कहानी है। दोस्ती से दुश्मनी, सत्ता से निर्वासन और अंततः इतिहास—‘बैटल ऑफ बेगम्स’ ने बांग्लादेश की राजनीति को गहराई से आकार दिया।
खालिदा के निधन के साथ यह लड़ाई खत्म हो गई, लेकिन इसके सबक आने वाली पीढ़ियों के लिए लंबे समय तक प्रासंगिक रहेंगे।
