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21 Jan 2026, Wed

भाजपा के ‘वार रूम’ से ममता बनर्जी के करीबी तक: झारखंड में जन्मे प्रतीक जैन का दिलचस्प राजनीतिक सफर

भाजपा के ‘वार रूम’ से ममता बनर्जी के करीबी तक: झारखंड में जन्मे प्रतीक जैन का दिलचस्प राजनीतिक सफर

भारतीय राजनीति में अक्सर ऐसे चेहरे सामने आते हैं, जो मंच से ज़्यादा रणनीति के कमरे (War Room) में सक्रिय रहते हैं। झारखंड में जन्मे प्रतीक जैन भी ऐसे ही एक नाम हैं, जिनका राजनीतिक सफर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के चुनावी वार रूम से शुरू होकर आज ममता बनर्जी के भरोसेमंद रणनीतिकारों में गिना जाता है।

प्रतीक जैन की कहानी भारतीय राजनीति में रणनीतिक पेशेवरों के बढ़ते प्रभाव और बदलते राजनीतिक समीकरणों को समझने का एक अहम उदाहरण है।


झारखंड से राष्ट्रीय राजनीति तक की शुरुआत

प्रतीक जैन का जन्म झारखंड में हुआ। शुरुआती शिक्षा और युवावस्था के दौरान ही उनकी रुचि राजनीति, जनसंपर्क और रणनीतिक सोच में दिखने लगी थी। वे उन लोगों में शामिल रहे, जिन्होंने पारंपरिक राजनीतिक कार्यकर्ता बनने के बजाय डेटा, कम्युनिकेशन और मैनेजमेंट आधारित राजनीति को अपना रास्ता बनाया।

उनकी पहचान एक ऐसे प्रोफेशनल के रूप में बनी, जो चुनावों को केवल भाषण और रैलियों तक सीमित नहीं मानता, बल्कि मैसेजिंग, माइक्रो-प्लानिंग और ग्राउंड इनपुट्स पर ज़ोर देता है।


भाजपा के ‘वार रूम’ में भूमिका

प्रतीक जैन का राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश भारतीय जनता पार्टी के साथ हुआ। वे पार्टी के चुनावी अभियानों में बैक-एंड रणनीतिकार के रूप में जुड़े और धीरे-धीरे भाजपा के ‘वार रूम’ कल्चर का हिस्सा बने।

इस दौर में उनकी जिम्मेदारियों में शामिल रहा:

  • चुनावी डेटा और फीडबैक का विश्लेषण

  • सोशल मीडिया और कम्युनिकेशन रणनीति

  • बूथ-स्तरीय रिपोर्टिंग और माइक्रो-मैनेजमेंट

  • ज़मीनी मुद्दों को केंद्रीय नेतृत्व तक पहुँचाना

भाजपा के साथ काम करते हुए प्रतीक जैन ने यह समझ विकसित की कि आधुनिक चुनाव सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि संदेश और धारणा (Narrative) से जीते जाते हैं।


राजनीति में रणनीतिक पेशेवरों का उभार

प्रतीक जैन जैसे लोग उस नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहाँ राजनीति में:

  • प्रोफेशनल स्ट्रैटेजिस्ट

  • डेटा एनालिस्ट

  • कम्युनिकेशन एक्सपर्ट

की भूमिका लगातार बढ़ी है। यह दौर बताता है कि पार्टियाँ अब केवल विचारधारा पर नहीं, बल्कि चुनावी प्रबंधन पर भी उतना ही ध्यान दे रही हैं।


बंगाल की राजनीति और बड़ा मोड़

भाजपा के साथ काम करने के बाद प्रतीक जैन का करियर एक नए मोड़ पर पहुंचा, जब वे पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय रूप से दिखने लगे। यहीं से उनका नाम धीरे-धीरे ममता बनर्जी के नज़दीकी रणनीतिकारों में गिना जाने लगा।

पश्चिम बंगाल की राजनीति देश की सबसे जटिल और चुनौतीपूर्ण राजनीति में से एक मानी जाती है। यहाँ:

  • क्षेत्रीय पहचान

  • सांस्कृतिक भावनाएँ

  • तीखा राजनीतिक संघर्ष

रणनीति को बेहद संवेदनशील बनाते हैं। प्रतीक जैन ने इस माहौल में खुद को कम्युनिकेशन और रणनीतिक समन्वय के ज़रिये स्थापित किया।


ममता बनर्जी के करीबी कैसे बने?

सूत्रों के अनुसार, प्रतीक जैन ने बंगाल में काम करते हुए:

  • स्थानीय मुद्दों की गहरी समझ विकसित की

  • चुनावी मैसेजिंग को क्षेत्रीय संवेदनाओं के अनुसार ढाला

  • संगठन और नेतृत्व के बीच रणनीतिक सेतु की भूमिका निभाई

इसी वजह से वे धीरे-धीरे ममता बनर्जी के भरोसेमंद लोगों में गिने जाने लगे। यह बदलाव यह भी दिखाता है कि भारतीय राजनीति में अब राजनीतिक निष्ठा से ज़्यादा पेशेवर क्षमता कई बार निर्णायक बनती है।


भाजपा से टीएमसी तक: राजनीति का बदलता चेहरा

प्रतीक जैन का सफर इस बात का उदाहरण है कि भारतीय राजनीति अब केवल पार्टी लाइन से नहीं चलती। रणनीतिकारों और सलाहकारों की दुनिया में:

  • विचारधारा से ज़्यादा कौशल

  • स्थायी संगठन से ज़्यादा प्रोजेक्ट-आधारित काम

महत्वपूर्ण होता जा रहा है। यही वजह है कि एक ही व्यक्ति अलग-अलग राजनीतिक ध्रुवों में काम करता हुआ दिख सकता है।


आलोचना और बहस

हालाँकि, प्रतीक जैन का यह सफर आलोचनाओं से भी अछूता नहीं रहा। राजनीतिक हलकों में अक्सर सवाल उठते हैं:

  • क्या रणनीतिकार विचारधारा से ऊपर हो गए हैं?

  • क्या चुनावी पेशेवर राजनीति को कॉरपोरेट मॉडल में बदल रहे हैं?

इन सवालों के बीच प्रतीक जैन जैसे नाम इस बहस का केंद्र बन जाते हैं।


झारखंड से बंगाल तक: एक प्रतीकात्मक यात्रा

झारखंड जैसे राज्य से निकलकर देश की सबसे हाई-प्रोफाइल राजनीतिक लड़ाइयों में भूमिका निभाना, प्रतीक जैन के सफर को खास बनाता है। यह यात्रा दिखाती है कि नई राजनीति में भूगोल से ज़्यादा स्किल मायने रखती है।


निष्कर्ष

भाजपा के ‘वार रूम’ से लेकर ममता बनर्जी के करीबी रणनीतिकार बनने तक प्रतीक जैन का सफर भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप को समझने की कुंजी है। यह कहानी बताती है कि आज की राजनीति केवल नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे काम करने वाले पेशेवरों की रणनीतियों से भी तय होती है।

प्रतीक जैन का नाम आने वाले समय में भी राजनीतिक रणनीति और चुनावी प्रबंधन की चर्चाओं में बना रह सकता है—क्योंकि वे उस दौर के प्रतिनिधि हैं, जहाँ राजनीति और प्रोफेशनलिज़्म का मेल निर्णायक बन चुका है।

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