Breaking
21 Jan 2026, Wed

मद्रास हाईकोर्ट: दरगाह के पास दीप जलाने की अनुमति को मिली हरी झंडी

मद्रास हाईकोर्ट: दरगाह के पास दीप जलाने की अनुमति को मिली हरी झंडी

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसले में दरगाह के समीप दीप जलाने की अनुमति को हरी झंडी देते हुए धार्मिक स्वतंत्रता, सांप्रदायिक सौहार्द और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन को रेखांकित किया है। यह निर्णय न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में है, क्योंकि यह धार्मिक आचरण के अधिकार और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से जुड़े संवैधानिक सिद्धांतों को स्पष्ट करता है।

यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सार्वजनिक स्थलों और धार्मिक स्थलों के आसपास धार्मिक गतिविधियों को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी हुई है। अदालत का यह फैसला स्पष्ट करता है कि कानून व्यवस्था बनाए रखते हुए परंपराओं का सम्मान किया जा सकता है।


क्यों चर्चा में है मामला?

दरगाह के पास दीप जलाने को लेकर स्थानीय प्रशासन ने कानून-व्यवस्था और संभावित तनाव का हवाला देते हुए आपत्ति जताई थी। इसके खिलाफ याचिका दायर की गई, जिसमें तर्क दिया गया कि—

  • दीप जलाना शांतिपूर्ण धार्मिक अभिव्यक्ति है

  • इससे किसी अन्य समुदाय की धार्मिक भावनाएँ आहत नहीं होतीं

  • यह गतिविधि वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है

मामले की सुनवाई के बाद मद्रास हाईकोर्ट ने परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर अनुमति देने का मार्ग प्रशस्त किया


हाईकोर्ट का दृष्टिकोण और प्रमुख टिप्पणियाँ

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि—

  • संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता देता है

  • यह स्वतंत्रता सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है

  • यदि कोई धार्मिक गतिविधि शांतिपूर्ण है और उससे सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की आशंका नहीं है, तो उसे केवल आशंकाओं के आधार पर रोका नहीं जा सकता

अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासन का दायित्व केवल प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए उचित व्यवस्था करना भी है।


धार्मिक सौहार्द और सह-अस्तित्व पर जोर

कोर्ट ने अपने फैसले में तमिलनाडु की बहु-सांस्कृतिक और बहुधार्मिक परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि—

  • दरगाहें ऐतिहासिक रूप से सभी समुदायों के लिए श्रद्धा और आस्था का केंद्र रही हैं

  • विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा एक-दूसरे की परंपराओं में भागीदारी भारतीय संस्कृति की विशेषता है

  • कानून का उद्देश्य इस सांझी विरासत की रक्षा करना होना चाहिए

यह टिप्पणी खास तौर पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता (Positive Secularism) की अवधारणा को मजबूत करती है।


शर्तों के साथ अनुमति

हाईकोर्ट ने अनुमति देते हुए कुछ महत्वपूर्ण शर्तों पर भी जोर दिया—

  • दीप जलाने की प्रक्रिया शांतिपूर्ण हो

  • किसी प्रकार की उकसावे वाली गतिविधि न हो

  • स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा कानून-व्यवस्था सुनिश्चित की जाए

  • निर्धारित समय और स्थान की सीमाओं का पालन किया जाए

इन शर्तों के माध्यम से अदालत ने यह स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन के साथ जुड़ी हुई है।


संविधान और न्यायिक संतुलन

यह फैसला भारतीय संविधान के दो अहम मूल्यों के बीच संतुलन को दर्शाता है—

  1. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

  2. सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक शांति

अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया कि राज्य का धर्मनिरपेक्ष होना किसी धार्मिक अभिव्यक्ति के दमन का आधार नहीं बन सकता। बल्कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है—सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान


पहले के न्यायिक दृष्टांतों से मेल

मद्रास हाईकोर्ट का यह निर्णय उन पूर्व न्यायिक दृष्टांतों के अनुरूप है, जिनमें कहा गया है कि—

  • केवल संभावित तनाव की आशंका से धार्मिक गतिविधियों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता

  • प्रशासन को पहले व्यवस्था बनाए रखने के उपाय अपनाने चाहिए

  • प्रतिबंध अंतिम विकल्प होना चाहिए, न कि पहला

इससे यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका अधिकारों और दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखने के पक्ष में है।


सामाजिक और प्रशासनिक प्रभाव

इस फैसले के व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं—

  • धार्मिक स्थलों के आसपास होने वाली गतिविधियों के मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश

  • स्थानीय प्रशासन के लिए जिम्मेदारी का दायरा स्पष्ट

  • धार्मिक समुदायों के बीच विश्वास और संवाद को बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे फैसले समाज में संविधान पर भरोसा मजबूत करते हैं।


निष्कर्ष

दरगाह के पास दीप जलाने की अनुमति पर मद्रास हाईकोर्ट की हरी झंडी यह दर्शाती है कि भारतीय न्यायपालिका धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक शांति के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। यह फैसला बताता है कि संवैधानिक मूल्यों के तहत शांतिपूर्ण धार्मिक आचरण को संरक्षण मिलना चाहिए, बशर्ते वह कानून-व्यवस्था के दायरे में हो।

यह निर्णय न केवल एक स्थानीय विवाद का समाधान है, बल्कि यह भारत की सांझी संस्कृति, सहिष्णुता और संवैधानिक नैतिकता का भी सशक्त उदाहरण है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *