गोरखपुर में महिला सिपाहियों से प्रेग्नेंसी टेस्ट की अनिवार्यता: सिस्टम से सवाल, आत्मसम्मान पर चोट
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित पीएसी ट्रेनिंग सेंटर में उस वक्त हंगामा खड़ा हो गया, जब 600 महिला सिपाहियों को ट्रेनिंग शुरू होने से पहले अनिवार्य प्रेग्नेंसी टेस्ट कराने का आदेश दिया गया। इस फैसले ने न केवल महिला रिक्रूट्स की भावनाओं को आहत किया, बल्कि पूरे सिस्टम पर भी सवाल खड़े कर दिए कि क्या आज भी महिला सशक्तिकरण सिर्फ नारों तक ही सीमित है?
क्या था मामला?
गोरखपुर के पीएसी ट्रेनिंग सेंटर में भर्ती होकर पहुंचीं 600 महिला सिपाहियों को ट्रेनिंग शुरू करने से पहले मेडिकल टेस्ट की जानकारी दी गई। इसमें एक शर्त ने सभी को हैरान कर दिया—प्रेग्नेंसी टेस्ट अनिवार्य है। यह आदेश DIG रोहन पी कनय की ओर से दिया गया था।
इस खबर के फैलते ही रिक्रूट्स में रोष फैल गया। कई महिला सिपाहियों की आंखों में आंसू थे, तो कई ने खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि यह न सिर्फ उनकी निजता का उल्लंघन है, बल्कि अपमानजनक भी है।
खराब व्यवस्थाओं ने और बढ़ाया गुस्सा
महिला रिक्रूट्स का गुस्सा सिर्फ प्रेग्नेंसी टेस्ट तक सीमित नहीं था। उन्होंने यह भी बताया कि सेंटर में मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव है।
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250 की क्षमता वाले कैंपस में 600 महिलाओं को ठूंस दिया गया।
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बिजली और पानी की समुचित व्यवस्था नहीं है।
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नहाने के लिए खुले में जाना पड़ता है।
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सबसे गंभीर आरोप यह था कि बाथरूम के पास CCTV कैमरे लगे हैं।
हालांकि जांच में इन कैमरों की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन महिलाओं की आशंका ही यह दर्शाने के लिए काफी है कि उन्हें वहां कितनी असुरक्षा महसूस हो रही थी।
आदेश वापसी और अफसरों पर कार्रवाई
मामला जब मीडिया में आया और जन आक्रोश बढ़ा, तो सरकार हरकत में आई। IG चंद्र प्रकाश ने तत्काल प्रभाव से प्रेग्नेंसी टेस्ट का आदेश रद्द कर दिया और नई गाइडलाइन जारी की कि गर्भवती महिला सिपाही स्वयं बैच बदलवाने की मांग कर सकती हैं।
इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ी कार्रवाई करते हुए DIG रोहन पी कनय को पद से हटा दिया। साथ ही प्लाटून कमांडर संजय राय और पीएसी अधिकारी आनंद कुमार को भी सस्पेंड कर दिया गया।
प्रेग्नेंसी टेस्ट: मेडिकल प्रक्रिया या निजता पर हमला?
प्रेग्नेंसी टेस्ट को लेकर सरकार या पुलिस प्रशासन भले इसे एक सामान्य मेडिकल प्रक्रिया बताए, लेकिन इसकी अनिवार्यता और जबरन करवाने की मंशा ने इसे विवादास्पद बना दिया। महिलाओं की सहमति के बिना ऐसा कोई टेस्ट कराना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
आज जब देश महिला सशक्तिकरण, समानता और सुरक्षा की बात करता है, तब इस तरह के आदेश उस सोच को झुठलाते हैं। खासकर तब, जब वो महिलाएं जिनका सपना पुलिस सेवा में योगदान देने का है, उन्हें इस तरह की परिस्थिति से गुजरना पड़े।
क्या वाकई सिस्टम तैयार है महिला सशक्तिकरण के लिए?
इस घटना ने सिर्फ एक ट्रेनिंग सेंटर की समस्या उजागर नहीं की, बल्कि पूरे पुलिस महकमे की संवेदनशीलता, अनुशासन और दृष्टिकोण पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जब महिला रिक्रूट्स को सम्मानजनक माहौल, बुनियादी सुविधाएं और निजता का अधिकार नहीं मिल पा रहा, तब यह कहना मुश्किल नहीं कि हमारी संस्थाएं अभी भी मानसिक रूप से महिला सशक्तिकरण के लिए तैयार नहीं हैं।
निष्कर्ष: आत्मसम्मान से समझौता नहीं
गोरखपुर की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या कानून के रखवालों को पहले खुद संविधान के अधिकारों की समझ होनी चाहिए? जब किसी महिला को सुरक्षा देने वाला सिस्टम ही असंवेदनशील हो जाए, तो भरोसा टूटता है।
सरकार ने कार्रवाई करके संकेत जरूर दिया कि वह महिलाओं के सम्मान से समझौता नहीं करेगी, लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। इसके लिए सिर्फ नियम नहीं, सोच और व्यवस्था में भी सुधार जरूरी है।
