सिर्फ 240 सांसदों वाली बीजेपी बदल रही संविधान… पीएम-सीएम को पद से हटाने वाले विधेयक पर विपक्ष ने जताया विरोध
नई दिल्ली: संसद के मानसून सत्र में बीजेपी सरकार द्वारा लाए गए एक नए विधेयक ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। विपक्षी दलों का कहना है कि मात्र 240 सांसदों वाली बीजेपी संवैधानिक ढांचे के साथ छेड़छाड़ कर रही है। यह विधेयक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पद से हटाने की नई प्रक्रिया को लेकर आया है, जिसे लेकर संसद से लेकर सड़कों तक घमासान मचा हुआ है।
विपक्ष का हमला: “यह लोकतंत्र पर सीधा हमला”
कांग्रेस, राजद, तृणमूल कांग्रेस, आप और वाम दलों ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया। विपक्ष का आरोप है कि बीजेपी बहुमत में न होते हुए भी संविधान बदलने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा:
“मात्र 240 सांसदों के सहारे यह सरकार पूरे संविधान को पलट देना चाहती है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पद से हटाने का अधिकार जनता और विधायिका के पास है, न कि किसी एकतरफा बनाई गई प्रक्रिया के जरिए।”
राजद सांसद तेजस्वी यादव ने कहा कि यह विधेयक लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने वाला है। उन्होंने कहा:
“जनता से चुने गए नेताओं को हटाने का फैसला सड़क से संसद तक जनता के प्रतिनिधियों को करना चाहिए, न कि बीजेपी की सुविधानुसार बनाए गए किसी नए कानून से।”
बीजेपी का बचाव: “व्यवस्था को पारदर्शी बनाना जरूरी”
बीजेपी की ओर से संसदीय कार्यमंत्री ने दावा किया कि यह विधेयक पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। उनका कहना था कि अगर कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन नहीं करता या भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है, तो जनता के हित में उसे हटाने की तेज़ और प्रभावी प्रक्रिया होनी चाहिए।
बीजेपी सांसदों ने यह भी जोड़ा कि यह विधेयक अभी प्रारंभिक रूप में है और उस पर संसदीय समिति में विस्तार से चर्चा होगी।
संविधान बदलने की बहस
संविधान संशोधन को लेकर विपक्ष ने यह भी सवाल उठाया कि दो-तिहाई बहुमत के बिना इस तरह का बदलाव कैसे संभव है। कई विधि विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को हटाने की प्रक्रिया पहले से ही संविधान और संसद/विधानसभा की शक्तियों में निहित है।
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प्रधानमंत्री लोकसभा के विश्वास मत पर निर्भर रहते हैं।
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मुख्यमंत्री विधानसभा के विश्वास मत से पद पर बने रहते हैं।
ऐसे में नया विधेयक लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत माना जा रहा है।
जनता के बीच चर्चा
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गरमा गया है। ट्विटर (एक्स) पर #SaveConstitution और #ModiBill जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। युवाओं और छात्र संगठनों ने कहा कि यह विधेयक लोकतंत्र को कमजोर करेगा। वहीं बीजेपी समर्थकों ने इसे “मजबूत लोकतंत्र की दिशा में कदम” बताया।
विपक्षी एकता पर असर
यह विधेयक विपक्षी एकता के लिए एक नया मौका बनता दिख रहा है। INDIA गठबंधन के नेता इसे लेकर एकजुट दिखे। संसद में सभी विपक्षी दलों ने जोरदार विरोध किया और वॉकआउट तक किया। माना जा रहा है कि इस मुद्दे को विपक्ष आने वाले चुनावों में “संविधान बचाओ आंदोलन” के रूप में जनता तक ले जाएगा।
विशेषज्ञों की राय
राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर और संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विधेयक कई सवाल खड़े करता है।
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क्या यह लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का जरिया बनेगा?
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क्या इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया जा सकेगा?
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क्या जनता का विश्वास मत ही अंतिम पैमाना नहीं होना चाहिए?
विशेषज्ञों ने कहा कि इस तरह के विधेयक लोकतंत्र की बुनियादी संरचना पर चोट करते हैं और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की पूरी संभावना है।
निष्कर्ष
बीजेपी के इस कदम ने एक बार फिर से संविधान बदलने की बहस को हवा दे दी है। विपक्ष इसे लोकतंत्र और संविधान पर हमला बता रहा है, जबकि बीजेपी इसे पारदर्शिता और जवाबदेही का नया मॉडल कह रही है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह विधेयक संसद में पास हो पाता है या विपक्ष की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद सरकार को पीछे हटना पड़ता है। फिलहाल, इतना तय है कि यह मुद्दा आने वाले समय में बिहार से दिल्ली तक की राजनीति का केंद्र बना रहेगा और संविधान की रक्षा बनाम सुधार की बहस और तेज होगी।
