चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा: 5 बड़े मुद्दों पर हुई अहम चर्चा
चीन के विदेश मंत्री वांग यी (Wang Yi) ने मंगलवार, 19 अगस्त 2025 को अपनी भारत यात्रा पूरी की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने सबसे पहले भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिष्टाचार भेंट की। भारत और चीन के बीच यह उच्चस्तरीय कूटनीतिक वार्ता ऐसे समय में हुई जब दोनों देशों के संबंध कई संवेदनशील मुद्दों से प्रभावित हैं—सीमा विवाद, आतंकवाद, ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन के बांध निर्माण और ताइवान से जुड़े मामले।
इस यात्रा के बाद वांग यी पाकिस्तान भी जाएंगे जहां वे पाकिस्तान-चीन विदेश मंत्रियों की छठी रणनीतिक वार्ता की सह-अध्यक्षता करेंगे। लेकिन भारत यात्रा के दौरान हुए संवाद ने दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का संदेश दिया। आइए विस्तार से समझते हैं कि इस यात्रा के दौरान किन 5 बड़े मुद्दों पर चर्चा हुई और इसके क्या नतीजे निकले।
1. सीमा विवाद और SR वार्ता
भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा विवाद चला आ रहा है, खासकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के क्षेत्रों को लेकर। वांग यी की इस यात्रा में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोवाल के साथ 24वीं विशेष प्रतिनिधि (Special Representative – SR) वार्ता आयोजित की गई। इस बैठक में दोनों पक्षों ने सीमा पर तनाव कम करने और सीमांकन को स्पष्ट करने पर जोर दिया।
भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीमा विवाद के समाधान के लिए निरंतर संवाद और विश्वास बहाली आवश्यक है। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि शांति और स्थिरता ही आगे के द्विपक्षीय संबंधों की नींव है।
2. आतंकवाद और सुरक्षा सहयोग
भारत ने इस बैठक में आतंकवाद के मुद्दे को सख्ती से उठाया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया कि सीमा पार से होने वाला आतंकवाद भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
भारत ने चीन को याद दिलाया कि शंघाई सहयोग संगठन (SCO) का मूल उद्देश्य ही आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद से निपटना है। इस पर वांग यी ने सहमति जताई और कहा कि आतंकवाद से लड़ना भारत और चीन दोनों की साझा प्राथमिकता है।
यह संकेत देता है कि भविष्य में सुरक्षा मामलों पर भारत और चीन के बीच सहयोग को और गहरा किया जा सकता है।
3. ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध निर्माण की चिंता
भारत की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक चीन द्वारा यारलुंग त्सांगपो (ब्रह्मपुत्र) नदी के निचले हिस्से में विशाल बांध निर्माण है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने इस मुद्दे को मजबूती से उठाया और कहा कि यह परियोजना भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर असम और अरुणाचल प्रदेश, के लिए गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक असर डाल सकती है।
भारत ने चीन से इस मामले में पारदर्शिता बनाए रखने की मांग की और डाटा साझा करने के महत्व पर बल दिया। हालांकि चीन ने अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का हवाला दिया, लेकिन बातचीत से संकेत मिला कि दोनों देश जल संसाधन प्रबंधन पर सहयोग के लिए रास्ता तलाश सकते हैं।
4. SCO शिखर बैठक और पीएम मोदी की भागीदारी
इस महीने चीन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की शिखर बैठक होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बैठक में अपनी भागीदारी की पुष्टि की है।
उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को धन्यवाद दिया और भरोसा जताया कि SCO जैसे बहुपक्षीय मंच क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए अहम भूमिका निभाएंगे।
भारत ने चीन की SCO अध्यक्षता का समर्थन किया और यह संकेत दिया कि बहुपक्षीय सहयोग भारत-चीन संबंधों को मजबूती देने का एक संतुलित मार्ग हो सकता है।
5. ताइवान मुद्दा और भारत का रुख
ताइवान पर चीन का रुख हमेशा कड़ा रहा है और वांग यी ने इस यात्रा के दौरान इसे दोहराया। हालांकि, भारत ने स्पष्ट किया कि ताइवान के साथ उसके आर्थिक, तकनीकी और सांस्कृतिक संबंध जारी रहेंगे।
विदेश मंत्रालय ने यह भी कहा कि चीन स्वयं भी ताइवान के साथ ऐसे संबंध बनाए हुए है, इसलिए भारत के संबंधों को किसी भी प्रकार से राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
यह बयान भारत के स्वतंत्र और संतुलित विदेश नीति दृष्टिकोण को दर्शाता है, जिसमें वह चीन की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए भी अपने हितों से समझौता नहीं करना चाहता।
आर्थिक सहयोग पर सहमति
इन पांच बड़े मुद्दों के अलावा, चीन ने भारत की तीन महत्वपूर्ण आर्थिक मांगों को पूरा करने का आश्वासन भी दिया।
-
उर्वरक आपूर्ति में बाधाओं को समाप्त करना
-
रेअर अर्थ मैग्नेट (Rare Earth Magnets) की आपूर्ति शुरू करना
-
टनेल बोरिंग मशीन के आयात की सुविधा देना
ये कदम भारत और चीन के बीच व्यापारिक सहयोग को नया आयाम दे सकते हैं।
निष्कर्ष: संवाद से सहयोग की ओर
वांग यी की यह भारत यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण रही। सीमा विवाद और आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर चर्चा करना इस बात का संकेत है कि दोनों देश तनाव के बावजूद बातचीत की राह बंद नहीं करना चाहते।
भारत ने जहां अपनी चिंताओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा, वहीं चीन ने भी भारत की कुछ आर्थिक मांगों को स्वीकार कर सहयोग बढ़ाने का संकेत दिया।
इस यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत और चीन के बीच संवाद और सहयोग ही भविष्य के रिश्तों की दिशा तय करेगा। आने वाले दिनों में SCO शिखर बैठक और अन्य बहुपक्षीय मंच इस संबंध को और मजबूती देने का अवसर प्रदान करेंगे।
लेखक की राय
भारत और चीन दोनों ही एशिया की बड़ी शक्तियां हैं। यदि ये सहयोग और विश्वास की दिशा में ठोस कदम उठाते हैं, तो न केवल द्विपक्षीय संबंध मजबूत होंगे बल्कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और विकास को भी गति मिलेगी।
