Breaking
21 Jan 2026, Wed

“Jan suraj” की दूसरी सूची जारी — बिहार चुनाव में प्रशांत किशोर की नई रणनीति और बढ़ती राजनीतिक चुनौती

prashant kishore

“Jan suraj” की दूसरी सूची जारी — बिहार चुनाव में प्रशांत किशोर की नई रणनीति और बढ़ती राजनीतिक चुनौती

पटना, 14 अक्तूबर 2025 — बिहार विधानसभा चुनाव से पहले प्रशांत किशोर की पार्टी “जन सुराज” ने अपने उम्मीदवारों की दूसरी सूची जारी कर दी है। इस सूची में कुल 65 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। यह कदम न केवल पार्टी के विस्तार का संकेत है बल्कि यह बताता है कि प्रशांत किशोर अब पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतर चुके हैं।

इस सूची को देखकर साफ है कि जन सुराज अपनी राजनीतिक जमीन को जातीय और सामाजिक संतुलन के आधार पर मजबूत करने की रणनीति अपना रहा है। पार्टी की पहली सूची पहले ही 9 अक्टूबर को जारी की जा चुकी थी, जिसमें 51 उम्मीदवार शामिल थे। इस तरह अब तक कुल 116 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए जा चुके हैं — जो 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा की लगभग आधी सीटों के बराबर है।


सामाजिक समीकरण पर फोकस

दूसरी सूची में जन सुराज ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का खास ध्यान रखा है। कुल 65 उम्मीदवारों में 19 उम्मीदवार आरक्षित श्रेणी (18 अनुसूचित जाति और 1 अनुसूचित जनजाति) से हैं, जबकि बाकी 46 उम्मीदवार सामान्य (अनारक्षित) सीटों से हैं।

सूत्रों के मुताबिक, इस सूची में विभिन्न समुदायों और वर्गों से उम्मीदवार शामिल किए गए हैं —

  • लगभग 14 उम्मीदवार अति पिछड़ा वर्ग (EBC) से,

  • 10 उम्मीदवार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से,

  • 11 सामान्य वर्ग से,

  • और 14 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया गया है।

इन 14 मुस्लिम उम्मीदवारों में से चार ऐसे भी हैं जो अति पिछड़ा वर्ग श्रेणी में आते हैं, जिससे पार्टी की “सर्वसमावेशी” छवि को मजबूती मिलती है।

महिला प्रतिनिधित्व पर भी जन सुराज ने ध्यान दिया है। इस सूची में दो महिलाओं को टिकट मिला है — तनुजा कुमारी (इसलामपुर, नालंदा जिला) और इंदु गुप्ता (हसनपुर, समस्तीपुर)।

दिलचस्प बात यह है कि हरनौत सीट, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का गृह क्षेत्र है, वहां से जन सुराज ने एक अनुसूचित जाति उम्मीदवार को अनारक्षित सीट पर उतारा है। यह पार्टी के संदेश “सभी वर्गों को समान सम्मान” को मजबूत करता है।


विवादों से निडर उम्मीदवार चयन

दूसरी सूची में एक नाम खास चर्चा में है — अभय कांत झा, जो भागलपुर दंगों के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से वकील रहे हैं। उन्हें टिकट देकर जन सुराज ने यह संकेत दिया है कि पार्टी किसी विवाद से डरने वाली नहीं है और वह न्याय तथा समानता की राजनीति पर भरोसा रखती है।

इसके अलावा, सीतामढ़ी से ज़ियाउद्दीन खान और कटिहार से डॉ. गाज़ी शारिक को टिकट देकर जन सुराज ने मुस्लिम समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की है। कुल मिलाकर, पार्टी ने 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को अब तक टिकट दिया है।


पहली सूची की झलक और कुल स्थिति

जन सुराज की पहली सूची 9 अक्टूबर को जारी हुई थी, जिसमें 51 उम्मीदवार थे। उसमें भी सामाजिक विविधता को ध्यान में रखा गया था — 17 EBC, 11 OBC, 9 सामान्य वर्ग और 7 मुस्लिम उम्मीदवार शामिल थे।
पहली सूची में कई जाने-माने नाम थे, जैसे कि पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की पोती जागृति ठाकुर को समस्तीपुर की मोरवा सीट से और लता सिंह को नालंदा की अस्तहवान सीट से टिकट दिया गया था।

दोनों सूचियों को मिलाकर अब तक जन सुराज ने 116 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है, जो पार्टी की गंभीरता और संगठित तैयारी को दर्शाता है।


राघोपुर सीट पर सस्पेंस बरकरार

इस सूची में सबसे बड़ा सस्पेंस राघोपुर सीट को लेकर है। यह सीट राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव की परंपरागत सीट मानी जाती है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा थी कि प्रशांत किशोर इस सीट पर किसी मजबूत उम्मीदवार को उतार सकते हैं, ताकि RJD को सीधी चुनौती दी जा सके।
लेकिन दूसरी सूची में भी राघोपुर से किसी का नाम घोषित नहीं किया गया है। इससे यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि किशोर इस सीट पर कोई खास रणनीति अपना रहे हैं या आखिरी क्षण में किसी ‘सरप्राइज’ उम्मीदवार की घोषणा कर सकते हैं।


टिकट वितरण पर उठे सवाल और नाराज़गी

जन सुराज की दूसरी सूची के जारी होते ही पार्टी के भीतर कुछ विरोध के स्वर भी सुनाई देने लगे। कई पुराने कार्यकर्ताओं ने टिकट वितरण को लेकर असंतोष जताया है। कुछ ने आरोप लगाया है कि टिकट “बेचे” गए हैं, जबकि कुछ का कहना है कि निष्ठावान कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज कर नए चेहरों को तरजीह दी गई है।

रिपोर्टों के अनुसार, सूची में कुछ उम्मीदवार ऐसे हैं जिनकी शैक्षणिक योग्यता बहुत सीमित है — यहां तक कि कुछ सिर्फ 5वीं या 8वीं पास उम्मीदवार भी शामिल हैं। हालांकि, पार्टी का तर्क है कि योग्यता सिर्फ डिग्री से नहीं, बल्कि “समाज सेवा और ईमानदारी” से तय होती है।

इसके साथ ही, इस सूची में 17 ऐसे उम्मीदवार भी हैं जो पहले अन्य राजनीतिक दलों में सक्रिय थे और अब जन सुराज में शामिल होकर टिकट पा गए हैं। इससे पार्टी पर “दल-बदलुओं को तरजीह देने” के आरोप लग रहे हैं।


रणनीति: नया चेहरा, नया समीकरण

प्रशांत किशोर की रणनीति साफ दिखाई देती है — वह पारंपरिक राजनीति से अलग हटकर “नए चेहरों” को सामने लाना चाहते हैं।
पहली सूची में डॉक्टर, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, इंजीनियर, और युवा उद्यमी शामिल थे। दूसरी सूची में भी यही विविधता बनी हुई है। पार्टी का लक्ष्य है कि वह “पुराने दलों की थकी हुई राजनीति” से अलग एक नया विकल्प पेश करे।

जन सुराज के समर्थक मानते हैं कि यह “जनता का आंदोलन” है, जबकि विरोधियों का कहना है कि यह एक राजनीतिक प्रयोग भर है, जिसका प्रभाव सीमित रहेगा।
लेकिन यह भी सच है कि बिहार की जनता में अब “परिवर्तन की चाह” स्पष्ट दिखने लगी है, और जन सुराज इसी भावना को पकड़ने की कोशिश कर रहा है।


चुनौतियाँ और जोखिम

  1. नाम पहचान की कमी
    अधिकांश उम्मीदवार नए हैं, जिनकी जनता में पहचान बहुत सीमित है। यह चुनाव में बड़ा जोखिम बन सकता है।

  2. संगठनात्मक ढांचा कमजोर
    जन सुराज का संगठन अभी उतना व्यापक नहीं है जितना RJD, JDU या BJP का है। बिना मजबूत ग्राउंड नेटवर्क के चुनाव जीतना कठिन होगा।

  3. अंदरूनी मतभेद
    टिकट वितरण को लेकर असंतोष यदि बढ़ा, तो पार्टी को नुकसान हो सकता है। प्रशांत किशोर को यह सुनिश्चित करना होगा कि पार्टी की आंतरिक एकता बनी रहे।

  4. मुख्यधारा दलों की प्रतिक्रिया
    बड़े दल जन सुराज के उभरते प्रभाव को रोकने के लिए रणनीति बना रहे हैं। आने वाले समय में इस पर राजनीतिक हमले बढ़ सकते हैं।


निष्कर्ष: अभी लंबा रास्ता बाकी है

प्रशांत किशोर की “जन सुराज” पार्टी बिहार की राजनीति में एक नई ऊर्जा लेकर आई है। दूसरी सूची ने पार्टी की विचारधारा, सामाजिक दृष्टिकोण और राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत दिया है।
पार्टी स्पष्ट रूप से यह संदेश दे रही है कि वह जातीय राजनीति के पार जाकर “योग्य, ईमानदार और स्थानीय” उम्मीदवारों को बढ़ावा देना चाहती है।

हालांकि, असली चुनौती अभी बाकी है — जमीन पर संगठन खड़ा करना, उम्मीदवारों की पहचान बनाना और जनता का भरोसा जीतना।
अगर जन सुराज इन चुनौतियों से पार पा लेता है, तो वह बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे के रूप में गंभीर विकल्प बन सकता है।
लेकिन अगर आंतरिक असंतोष और संसाधनों की कमी जारी रही, तो यह आंदोलन महज “एक प्रयोग” बनकर रह जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *