बिहार में महिला सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और सख्त प्रशासनिक संदेश सामने आया है। बिहार पुलिस ने कार्यस्थलों पर महिलाओं के उत्पीड़न के मामलों को लेकर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाने का ऐलान किया है। इस संबंध में बिहार के डीजीपी ने स्पष्ट किया है कि न केवल महिला उत्पीड़न, बल्कि शिकायत को दबाने या नजरअंदाज करने की कोशिश भी अपराध मानी जाएगी।
यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब सरकारी और निजी संस्थानों में महिलाओं की शिकायतों को गंभीरता से न लेने के आरोप लगातार सामने आ रहे थे।
कार्यस्थल पर महिला उत्पीड़न: अब कोई ढिलाई नहीं
डीजीपी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
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महिला कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना या भेदभाव किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
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सरकारी कार्यालयों, पुलिस विभाग, शैक्षणिक संस्थानों और निजी कार्यस्थलों पर लागू नियमों का सख्ती से पालन कराया जाएगा
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दोषी पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई के साथ विभागीय दंड भी दिया जाएगा
उन्होंने यह भी कहा कि महिला सुरक्षा केवल कागज़ी नीति नहीं, बल्कि व्यवहारिक अमल का विषय है।
शिकायत दबाना भी बनेगा अपराध
इस घोषणा का सबसे अहम पहलू यह है कि अब—
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यदि कोई अधिकारी, वरिष्ठ कर्मचारी या प्रबंधन
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महिला कर्मचारी की शिकायत को दर्ज करने से मना करता है,
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समझौते का दबाव बनाता है,
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या शिकायत को जानबूझकर लंबित रखता है
तो उसके खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
डीजीपी ने कहा कि शिकायत को दबाना, पीड़िता को दोबारा मानसिक उत्पीड़न के समान है और यह कानून के खिलाफ है।
POSH Act के पालन पर सख्ती
बिहार पुलिस मुख्यालय ने सभी सरकारी विभागों और संस्थानों को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम – POSH Act, 2013 का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
इसके तहत—
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हर कार्यालय में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन अनिवार्य
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समिति में महिला अध्यक्ष और बाहरी सदस्य की नियुक्ति
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शिकायतों की समयबद्ध सुनवाई
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पीड़िता की पहचान की गोपनीयता सुनिश्चित करना
जैसे नियमों को अनदेखा करने पर संबंधित संस्था और अधिकारियों पर कार्रवाई होगी।
पुलिस अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश
डीजीपी ने सभी जिलों के एसपी, सिटी एसपी और थानाध्यक्षों को निर्देश दिया है कि—
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महिला उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों को तत्काल प्राथमिकी (FIR) में बदला जाए
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पीड़िता के साथ संवेदनशील और सम्मानजनक व्यवहार किया जाए
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जांच में देरी या लापरवाही को अनुशासनहीनता माना जाएगा
उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी पुलिस थाने में महिला से जुड़ी शिकायत को दबाने की बात सामने आती है, तो संबंधित पुलिसकर्मियों पर कड़ी कार्रवाई तय है।
महिलाओं में बढ़ेगा भरोसा
विशेषज्ञों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह फैसला—
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महिलाओं को खुलकर शिकायत दर्ज कराने का आत्मविश्वास देगा
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कार्यस्थलों पर सुरक्षित माहौल बनाने में मदद करेगा
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प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करेगा
अब तक कई मामलों में महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से इसलिए डरती थीं, क्योंकि उन्हें बदले की कार्रवाई या करियर पर असर का खतरा महसूस होता था।
निजी संस्थानों पर भी नजर
डीजीपी ने स्पष्ट किया कि यह नीति केवल सरकारी कार्यालयों तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां, फैक्ट्रियां, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य संस्थान भी इसके दायरे में आएंगे।
यदि किसी निजी संस्थान में—
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POSH समिति नहीं बनाई गई
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शिकायतों की अनदेखी की गई
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या पीड़िता पर दबाव डाला गया
तो वहां भी पुलिस और प्रशासन कार्रवाई करेगा।
सामाजिक संदेश भी है यह कदम
यह फैसला केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ा नहीं है, बल्कि एक सशक्त सामाजिक संदेश भी देता है कि—
“महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।”
सरकार और पुलिस प्रशासन का यह रुख कार्यस्थलों पर सम्मान, समानता और सुरक्षित वातावरण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
निष्कर्ष
महिला उत्पीड़न पर बिहार पुलिस की यह सख्त नीति राज्य में महिला सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है।
जीरो टॉलरेंस, शिकायत दबाने पर अपराध, और POSH Act के सख्त पालन जैसे कदम यह साफ करते हैं कि अब लापरवाही या चुप्पी की कोई जगह नहीं है।
यदि इस नीति को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न सिर्फ बिहार बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक मॉडल बन सकता है।
