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21 Jan 2026, Wed

आधुनिकता की मार, फिर भी टिकी है परंपरा: मकर-टुसू पर्व पर मिट्टी के बर्तनों की मांग कायम

आधुनिकता की मार, फिर भी टिकी है परंपरा: मकर-टुसू पर्व पर मिट्टी के बर्तनों की मांग कायम

आधुनिकता की मार, फिर भी टिकी है परंपरा: मकर-टुसू पर्व पर मिट्टी के बर्तनों की मांग कायम

तेज़ी से बदलती जीवनशैली, प्लास्टिक और स्टील के बढ़ते इस्तेमाल के बीच भी भारतीय परंपराएँ अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। इसका जीवंत उदाहरण मकर-टुसू पर्व के दौरान देखने को मिलता है, जब मिट्टी के बर्तनों की मांग आज भी ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में बनी रहती है। आधुनिकता के दबाव के बावजूद यह पर्व न सिर्फ सांस्कृतिक पहचान को संजोए हुए है, बल्कि पारंपरिक कुम्हार समुदाय की आजीविका का भी सहारा बना हुआ है।


मकर-टुसू पर्व: आस्था, प्रकृति और परंपरा का संगम

मकर-टुसू पर्व विशेष रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के कुछ हिस्सों में मनाया जाता है। यह पर्व मकर संक्रांति के आसपास मनाया जाता है और प्रकृति, फसल तथा सामुदायिक एकता का प्रतीक माना जाता है।

टुसू देवी की पूजा, लोकगीतों की गूंज और सामूहिक आयोजन इस पर्व की पहचान हैं। खास बात यह है कि इस दौरान पूजा और अनुष्ठानों में मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है।


मिट्टी के बर्तनों का सांस्कृतिक महत्व

मकर-टुसू पर्व में उपयोग होने वाले मिट्टी के बर्तन केवल दैनिक उपयोग की वस्तुएं नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा के प्रतीक हैं।

इन बर्तनों में—

  • टुसू देवी की प्रतिमा

  • पूजा सामग्री

  • प्रसाद और अन्न

रखा जाता है। मान्यता है कि मिट्टी से बने बर्तन शुद्धता और प्रकृति के साथ सामंजस्य का प्रतीक होते हैं। यही कारण है कि आधुनिक बर्तनों की उपलब्धता के बावजूद पूजा में मिट्टी के बर्तनों को ही प्राथमिकता दी जाती है।


आधुनिकता की चुनौती, फिर भी कायम मांग

आज बाजार में स्टील, एल्युमिनियम और प्लास्टिक के बर्तन आसानी से उपलब्ध हैं। इनके मुकाबले मिट्टी के बर्तन—

  • जल्दी टूटने वाले

  • मेहनत से बनने वाले

  • और सीमित समय तक उपयोगी

माने जाते हैं। इसके बावजूद मकर-टुसू पर्व के दौरान इनकी मांग में खासा इजाफा देखा जाता है।

ग्रामीण इलाकों में हर साल इस पर्व से पहले कुम्हारों के यहां चहल-पहल बढ़ जाती है। लोग पारंपरिक हांडी, दीया, कलश और छोटे मिट्टी के पात्र खरीदते हैं, ताकि पूजा विधि को परंपरागत तरीके से पूरा किया जा सके।


कुम्हार समुदाय के लिए आजीविका का सहारा

मिट्टी के बर्तनों की यह मौसमी मांग कुम्हार समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर लेकर आती है। पूरे साल सीमित आमदनी के बाद मकर-टुसू पर्व उनके लिए—

  • अतिरिक्त रोजगार

  • आय में बढ़ोतरी

  • और पारंपरिक कला को जीवित रखने का मौका

प्रदान करता है।

कई कुम्हार परिवार महीनों पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। वे जंगलों और खेतों से उपयुक्त मिट्टी लाकर, उसे गूंथकर और चाक पर आकार देकर बर्तन बनाते हैं। यह प्रक्रिया न केवल मेहनतभरी होती है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही कला का प्रदर्शन भी है।


पर्यावरण के अनुकूल विकल्प

आज जब पर्यावरण संरक्षण की चर्चा हर मंच पर हो रही है, मिट्टी के बर्तन एक इको-फ्रेंडली विकल्प के रूप में उभरते हैं।

  • ये प्राकृतिक होते हैं

  • उपयोग के बाद मिट्टी में मिल जाते हैं

  • किसी तरह का प्रदूषण नहीं फैलाते

मकर-टुसू पर्व के दौरान इनका उपयोग यह संदेश देता है कि परंपराएं अपने आप में पर्यावरण संरक्षण का ज्ञान समेटे हुए हैं।


लोकगीत, मेले और सामुदायिक जीवन

मकर-टुसू पर्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। यह पर्व—

  • लोकगीतों

  • नृत्य

  • और गांवों में लगने वाले मेलों

के माध्यम से सामुदायिक जीवन को मजबूत करता है। इन मेलों में मिट्टी के बर्तनों की दुकानें विशेष आकर्षण का केंद्र होती हैं। महिलाएं और बच्चे पारंपरिक बर्तनों को खरीदते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव महसूस करते हैं।


बदलते समय में परंपरा की जिजीविषा

शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। लेकिन मकर-टुसू पर्व यह साबित करता है कि जब तक परंपराओं का सामाजिक और धार्मिक महत्व बना रहेगा, तब तक उनसे जुड़ी कलाएं भी जीवित रहेंगी।

मिट्टी के बर्तन केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि पहचान, स्मृति और सामूहिक विरासत का हिस्सा हैं।


प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • मकर-टुसू पर्व: झारखंड और आसपास के क्षेत्रों का प्रमुख लोकपर्व

  • विशेषता: टुसू देवी की पूजा और लोकगीत

  • परंपरा: पूजा में मिट्टी के बर्तनों का अनिवार्य उपयोग

  • सामाजिक महत्व: कुम्हार समुदाय की आजीविका

  • पर्यावरणीय पक्ष: इको-फ्रेंडली और प्राकृतिक


निष्कर्ष

आधुनिकता की मार के बावजूद मकर-टुसू पर्व पर मिट्टी के बर्तनों की मांग यह दिखाती है कि भारतीय परंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की राह भी हैं। यह पर्व न केवल सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि स्थानीय कारीगरों और पर्यावरण—दोनों के लिए आशा की किरण बनकर उभरता है।

मकर-टुसू पर्व हमें यह सिखाता है कि विकास की दौड़ में भी परंपरा और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना संभव है—बस ज़रूरत है उन्हें समझने और सम्मान देने की।

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