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21 Jan 2026, Wed

Amit Shah Speech: “देश के गृह मंत्री हैं, कुछ भी कह सकते हैं” — रामगोपाल यादव का तंज

Amit Shah Speech: “देश के गृह मंत्री हैं, कुछ भी कह सकते हैं” — रामगोपाल यादव का तंज

Amit Shah Speech: “देश के गृह मंत्री हैं, कुछ भी कह सकते हैं”— रामगोपाल यादव का तंज, विपक्ष ने बयान पर किया तीखा प्रहार

लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह के हालिया बयान ने राजनीतिक माहौल में नई हलचल पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को उनके भाषण की सराहना करते हुए कहा कि अमित शाह ने “चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के फैलाए गए झूठ का पर्दाफाश किया है।” प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद जहां सत्तापक्ष ने गृह मंत्री के भाषण को तथ्यों पर आधारित बताया, वहीं विपक्ष ने इसे “विवाद पैदा करने वाला” और “जनता को भ्रमित करने वाला” करार दिया।

लोकसभा में शाह द्वारा चुनावी सुधार, SIR प्रक्रिया और वोटर सत्यापन प्रणाली पर दिए गए बयानों को लेकर विपक्षी दलों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। सपा, कांग्रेस और आरजेडी के सांसदों ने शाह पर “मुद्दे से भटकाने”, “विपक्ष की आवाज दबाने” और “बहस का स्तर गिराने” जैसे आरोप लगाए हैं। आइए देखें कौन–क्या बोला।


रामगोपाल यादव का सीधा हमला: “गृह मंत्री हैं, इसलिए कुछ भी कह सकते हैं”

समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने अमित शाह के बयान को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा:

“वे देश के गृह मंत्री हैं, इसलिए कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन कई बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें उन्हें नहीं कहना चाहिए।”

यादव ने कहा कि गृह मंत्री का पद देश की एकता और अखंडता का प्रतीक होता है, इसलिए उनके बयान में संतुलन और जिम्मेदारी होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि शाह का बयान देश में “विभाजन का माहौल” पैदा कर सकता है और यह लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है।

सपा नेता ने आगे कहा कि सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष को “अहम मुद्दों से हटाने” और “चुनावी प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा करने” की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक बहस को कमज़ोर करती है।


कांग्रेस का आरोप: “सरकार विपक्ष की आवाज दबा रही”

कांग्रेस सांसद किरण कुमार चमाला ने भी गृह मंत्री के भाषण पर हमला किया और कहा कि सरकार SIR (Secure Identification Registration) को लेकर विपक्ष की शंकाओं का जवाब देने के बजाय बहस को “घुसपैठियों” की ओर मोड़ रही है।

चमाला ने कहा:

“हमारे सवाल SIR की वर्तमान स्थिति से जुड़े थे, लेकिन अमित शाह इसे घुसपैठ के मुद्दे से जोड़कर असल बहस को भटका रहे हैं।”

उन्होंने दावा किया कि बिहार में SIR प्रक्रिया लागू होने के बावजूद—

  • फर्जी वोट मौजूद हैं

  • एक व्यक्ति के कई EPIC (Election Photo ID Card) नंबर पाए जा रहे हैं

इन विसंगतियों को देखते हुए चमाला ने SIR को “सिर्फ दिखावा” बताया। उनके अनुसार सरकार “घुसपैठियों को हटाने” की बात कहकर जनता का ध्यान असली मुद्दों—चुनावी पारदर्शिता, फर्जी वोटिंग, निगरानी और प्रक्रियागत खामियों—से हटाने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस सांसद ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार विपक्ष को बोलने नहीं दे रही और संसदीय परंपराओं को कमज़ोर कर रही है।


आरजेडी सांसद मनोज झा की तीखी प्रतिक्रिया: “बहस का स्तर इतना नीचे जा सकता है, सोचा नहीं था”

आरजेडी सांसद मनोज झा ने भी अमित शाह के बयान पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की। उन्होंने बताया कि चुनाव प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर वे पहले चुनाव आयोग गए थे, लेकिन कोई समाधान नहीं मिला। उसके बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा, तभी मामले में प्रगति संभव हो सकी।

मनोज झा ने कहा:

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि लोकसभा में बहस का स्तर इतना नीचे जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि बहस में वह “मूल भावना” पूरी तरह गायब थी, जो चुनाव सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषय पर गंभीर और व्यापक चर्चा का आधार होना चाहिए था। झा ने संसद में बढ़ती राजनीतिक कटुता और आरोप–प्रत्यारोप की संस्कृति पर भी चिंता व्यक्त की।

उनका कहना था कि चुनाव सुधार एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर राजनीतिक दलों को मिलकर देशहित में काम करना चाहिए, लेकिन सरकार विपक्ष के सवालों को टालने और उन्हें नीचा दिखाने में अधिक दिलचस्पी दिखा रही है।


अमित शाह का बयान क्यों बना विवाद का कारण?

संसद में अमित शाह ने SIR, वोटर वेरिफिकेशन, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और घुसपैठ रोकने जैसे मुद्दों पर विस्तृत बयान दिया था।
उनके मुख्य बिंदु थे—

  • भारत में चुनाव प्रक्रिया दुनिया की सबसे पारदर्शी

  • घुसपैठियों को पहचानने के लिए कड़े कदम

  • वोटर डेटाबेस को अपडेट करने के लिए SIR आवश्यक

  • विपक्ष चुनाव सुधार को लेकर “भ्रम और झूठ” फैला रहा है

सत्तापक्ष के अनुसार यह बयान तथ्यों पर आधारित था, लेकिन विपक्ष का कहना है कि शाह ने जानबूझकर मुद्दे को “राष्ट्रीय सुरक्षा” के फ्रेम में रखकर चुनाव सुधार की मूल समस्याओं से ध्यान हटाया।


राजनीतिक विश्लेषण: क्या बढ़ रहा है टकराव?

विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 के राजनीतिक कैलेंडर में कई राज्यों के चुनाव और राष्ट्रीय स्तर की सियासी हलचल के बीच यह बहस आने वाले दिनों में और तेज़ हो सकती है।

दो बड़े निष्कर्ष सामने आते हैं—

1. चुनाव सुधार पर सरकार–विपक्ष की दूरी बढ़ रही

जहाँ सत्तापक्ष चुनावी प्रक्रिया को सुरक्षित और पारदर्शी बताते हुए SIR जैसे सुधारों की वकालत कर रहा है, वहीं विपक्ष इसे “तकनीकी खामियों से भरा” और “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बता रहा है।

2. संसदीय बहस की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल

मनोज झा और रामगोपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि विपक्ष संसदीय चर्चाओं में गिरते स्तर को लेकर बेहद चिंतित है।


निष्कर्ष

अमित शाह के हालिया भाषण ने जहां सत्तापक्ष को एकजुट किया है, वहीं विपक्ष ने इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक बताया है। चुनाव प्रक्रिया, SIR और वोटर सत्यापन जैसे जटिल मुद्दों पर व्यापक और संतुलित बहस की जरूरत है। लेकिन संसद में चल रही राजनीतिक बयानबाज़ी यह संकेत देती है कि आने वाले हफ्तों में इस विवाद का दायरा और बढ़ सकता है।

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